Monthly Archives: May 2017

भौतिकविदो का इतिहास : संक्षिप्त अवलोकन

विज्ञान विश्व

किसी प्रश्न में ‘क्यों’ शब्द की उपस्थिति हमारी जिज्ञासा को व्यक्त करती है। और निश्चित तौर पर हमारी जिज्ञासा ही हमें नए तथ्यो के खोज की तरफ अग्रसर करती है। यदि न्यूटन के मन में यह जानने की जिज्ञासा न आई होती कि “आखिर, सेब नीचे ही क्यों गिरा?” तो शायद हमें गुरुत्वाकर्षण के अस्तित्व को जानने में देरी हो सकती थी। महान भौतिकविद् अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह स्वीकार किया है कि

“मेरे अंदर कोई खास गुण नहीं है। मैं तो ऐसा व्यक्ति हूँ , जिसमें जिज्ञासा कूट-कूट कर भरी हुई है।”

यह एक स्वीकारोक्ति नहीं बल्कि मानव समाज को एक संदेश है कि नए तथ्यों के आविष्कार जिज्ञाशा से ही आती है। और वास्तव में जिज्ञाशा ही भौतिकी की जननी है। ‘ कुछ जानने की इच्छा’ ही हमें भौतिकी का आभास कराती है। और किसी प्रश्न में ‘कैसे’ शब्द की उपस्थिति हमारे कल्पना शक्ति को व्यक्त करती है। और हमारी…

View original post 2,835 more words

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रकार (Types of AI) : प्रतिक्रियात्मक से आत्मचेतन तक (From Reactive to Self-Aware)

विज्ञान विश्व

कंप्युटर गणना क्षमता तथा उससे संबधित तकनीक जैसे मशीन द्वारा सीखना(Machine Learning), न्युरल नेटवर्क. मानव भाषा संसाधन(Natural Language Processing), जिनेटिक अल्गारिथम तथा कंप्युटर सृजनात्मकता मे तीव्र विकास के साथ अब मशीने धीरे धीरे प्रतिक्रियात्मक मशीनो से आत्मचेतन मशीनो की ओर विकास कर रही है। इस इन्फ़ोग्राफ़िक मे हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI) की वर्तमान स्तिथि और उसके भविष्य की ओर एक नजर डालेंगे।

वर्ग 1 : पूर्ण प्रतिक्रियात्मक (Purely Reactive)

यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सबसे आधारभूत प्रकार है। यह वातावरण और परिस्थितियों से सीधे सूचना ग्रहण करता है और उसके आधार पर निर्णय लेता है। इसके पास विस्तृत विश्व की जानकारी नही होती है। यह अपने अनुभवों को संरक्षित नही कर सकता है, ना ही अपने अनुभवों के आधार पर वर्तमान समस्या पर निर्णय ले सकता है। यह केवल एक ही क्षेत्र मे विशेषज्ञता हासिल कर सकता है।

उदाहरण

  1. IBM का डीप ब्ल्यु जिसने कास्पोरोव को शतरंज मे हराया था।
  2. गूगल का…

View original post 233 more words

हमने अंको के बारे मे कैसे जाना ? : आइजैक आसीमोव

विज्ञान विश्व

अंक उन चिह्नों को कहते हैं जिनसे गिनतियाँ सूचित की जाती हैं, जैसे 1, 2, 3. . .4। स्वयं गिनतियों को संख्या कहते हैं। यह निर्विवाद है कि आदिम सभ्यता में पहले वाणी का विकास हुआ और उसके बहुत काल पश्चात्‌ लेखन कला का प्रादुर्भाव हुआ। इसी प्रकार गिनना सीखने के बहुत समय बाद ही संख्याओं को अंकित करने का ढंग निकाला गया होगा। वर्तमान समय तक बचे हुए अभिलेखों में सबसे प्राचीन अंक मिस्र (ईजिप्ट) और मेसोपोटेशिया के माने जाते हैं। इनका रचनाकाल 3,000 ईसा पूर्व के आसपास रहा होगा। ये अंक चित्रलिपि (हाइरोग्लिफिक्स) के रूप में हैं। इनमें किसी अंक के लिए चिड़िया, किसी के लिए फूल, किसी के लिए कुदाल आदि बनाए जाते थे। केवल अंक ही नहीं, शब्द भी चित्रलिपि में लिखे जाते थे।

आज से हजारों साल पहले ‘कितनी हैं?’ प्रश्न पूछने से पहले लोगों को अंकों की अवश्य जरूरत पड़ी होगी।

मान…

View original post 6,896 more words

Three Reasons Not To Be Hypocritical In Bhakti

Krishna's Mercy

[Krishna's lotus feet]“For sense enjoyment one can act in any capacity of the social order, but if one follows the rules and regulations of his particular status, he can make gradual progress in purifying his existence. But he who makes a show of being a yogi, while actually searching for the objects of sense gratification, must be called the greatest cheater, even though he sometimes speaks of philosophy.” (Shrila Prabhupada, Bhagavad-gita, 3.6 Purport)

All saints have a past. All sinners have a future. Thus don’t be too quick to judge someone. Be a little forgiving. To err is human, after all. The Vedas say that there are four general defects in man. I have the tendency to commit mistakes; hence being error-prone. I am easily illusioned; everything is not always as it seems. I have imperfect senses; I can’t see and hear everything. I also cheat; I know that outcomes are not…

View original post 752 more words

From Something As Simple As A Ring

Krishna's Mercy

[Sita-Rama]“Taking that ornament worn on the hand of her husband, from viewing it to Janaki it was like obtaining her husband’s company, so she felt delighted.” (Valmiki Ramayana, Sundara Kand, 36.4)

gṛhītvā prekṣamāṇā sā bhartuḥ kara vibhūṣaṇam |
bhartāram iva samprāptā jānakī muditā abhavat ||

Download this episode (right click and save)

God is not far, but the task is daunting. How do you find someone you can’t see? How do you believe in their existence when there has yet to be visual evidence? The secret is that the proof is already there; just the eyes have to be purified in order to see it. In the Brahma-samhita we learn that the wise souls have the salve of devotion applied to their eyes, premanjana.

“I worship the primeval Lord, Govinda, who is always seen by the devotee whose eyes are anointed with the pulp of love. He is seen…

View original post 931 more words

Does Krishna Love Both The Murderer And The Thief

Krishna's Mercy

[Lord Krishna]“For our understanding it is sometimes said that the Lord is situated in the heart of the thief as well as in the heart of the householder, but the Supersoul in the heart of the thief dictates, ‘Go and steal things from that particular house,’ and at the same time the Lord tells the householder, ‘Now be careful of thieves and burglars.’ These instructions to different persons appear contradictory, yet we should know that the Supersoul, the Supreme Personality of Godhead, has some plan, and we should not consider such activities contradictory.” (Shrila Prabhupada, Shrimad Bhagavatam, 4.17.36 Purport)

Download this episode (right click and save)

Friend1: I will get straight to it today.

Friend2: Okay.

Friend1: I saw something passing around on the internet, amongst devotees of the Supreme Personality of Godhead, Shri Krishna.

Friend2: Is it a meme? One of those pictures with large text written on it, intended…

View original post 1,021 more words