ओशो – सारी बात दृष्टि की है ।

Osho Hindi Speeches

मैं अपने एक मित्र के साथ एक

बगीचे की बेंच पर बैठा था।

विश्वविद्यालय में जब पढ़ता था तब की बात है।

सांझ का वक्त था, धुंधलका उतर आया था।

और दूर से एक लड़की आती हुई मालूम पड़ी।
उस मित्र ने उस लड़की की

तरफ कुछ वासना—भरी बातें कहीं।

जैसे—जैसे लड़की करीब आने लगी,

वह थोड़ा बेचैन हुआ। मैंने पूछा कि मामला क्या है?

तुम थोड़े लड़खड़ा गए! उसने कहा कि थोड़ा रुके;

मुझे डर है कि कहीं यह मेरी बहन न हो।
और जब वह और करीब आई और

बिजली के खंभे के नीचे आ

गई—वह उसकी बहन ही थी।

मैंने पूछा, अब क्या हुआ?

यह लड़की वही है; जरा धुंधलके में थी,

वासना जगी। पहचान न पाए, वासना जगी।

अब पास आ गई, अब थोड़ा खोजो

अपने भीतर, कहीं वासना है?
वह कहने लगा,

सिवाय पश्चात्ताप के और कुछ भी नहीं।

दुखी हूं कि ऐसी बात मैंने…

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