स्वच्छता … ( महात्मा गांधी )

स्वार्थ

gandhi2“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन/दिमाग का वास हो सकता है”|

कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लापरवाही से इधर उधर थूक कर, कूड़ा करकट फेंककर या अन्य तरीकों से जमीन को गंदा करता है, वह इंसान और प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है| दुर्भाग्य से हम सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता की महत्ता को नहीं समझते|

हम अपने कुओं, पोखरों और नदियों की शुद्धता का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते और उनके किनारे ही गंदे नहीं करते वरन अपने शरीर की गंदगी से इन प्राकृतिक वरदानों के जल को भी गंदा करते हैं| भारतीयों की इस बेहद शर्मनाक कमी से ही हमारे गाँवों में असम्मानजनक स्थितियां बनी रहती हैं और इसी कारण पवित्र नदियों के पवित्र किनारे गंदे दिखाई देते हैं और इस कारण उत्पन्न अस्वच्छता से विभिन्न बीमारियाँ भारतीयों को अपना शिकार बनाए रखती है|

“देश के अपने भ्रमण के दौरान मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ गंदगी को…

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