प्रकृति एवं जैव-विविधता – महात्मा गाँधी

स्वार्थ

Gandhiहम प्रकृति के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पारिस्थितिकी आंदोलन (इकॉलोजी मूवमेंट) तब तक नहीं चला सकते जब तक कि अहिंसा के नियम मानव सभ्यता के केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाते|

इंसान के पास जीवन को रचने की शक्ति नहीं है और इसीलिये उसके पास जीवन को नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है|

किसी भी समाज को इस कसौटी पर जांचा जा सकता है कि उसका जानवरों के प्रति व्यवहार कैसा है?

यह कहना एक अहंकारजनित अवधारणा है कि मानव के पास बाकी जीव जंतुओं का स्वामितव है और वह उनका भगवान है| इसके उलट, प्रकृति दवारा मानव जीवन को दिए गये वरदानों के कारण, मानव को एक ट्रस्टी के रूप में जीव-जंतुओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी चाहिए|

वन्य जीवन जंगलों में कम होता जा रहा है लेकिन शहरों में यह बढ़ता ही जाता है|

जीवन में हम अपने आसपास जितनी भी विविधता देखते हैं प्रकृति ने एक…

View original post 64 more words

Advertisements