जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

स्वार्थ

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं|…

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