T-22/2 दो क़दम चल के ठहर जाना है-समर कबीर

दो क़दम चल के ठहर जाना है
सख़्त मुश्किल है मगर जाना है

जिन अंधेरों से गुज़र जाना है
रोशनी लेके उधर जाना है

हस्बे-मामूल तिरे क़दमों में
रात होते ही बिखर जाना है

मुझ पे लाज़िम है हिफ़ाज़त सबकी
आप लोगों को तो घर जाना है

कौन समझा है मेरी ग़ज़लों को
किस ने मेरा ये हुनर जाना है

पीके उन आँखों से सहबा-ए-वफ़ा
सरहदे-ग़म से गुज़र जाना है

उसकी ग़फ़लत का बयाँ कैसे करूँ
शाम को जिसने सहर जाना है

मालो दौलत हो कि हो इज़्ज़त-ए-नफ़्स
सब तेरे ज़ेर-ए -असर जाना है

किसने पाई है यहाँ ख़िज़्र की उम्र
एक दिन सबको “समर” जाना है

समर कबीर मो.9753845522

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