पांडव की मातृ भक्ति,

ईश्वर की आभा लिये ,जो निरंतर भक्ति में  लीन रहती हैं, समस्त आठों पटरानियाॅ और सौलहहजार एकसौ रानियाॅ जो इस श्यामल भूमि भारत में कृष्ण की लीलाओं का साध्वी रूप में रहकर गुणगान करती हैं उन्हें प्रणाम करते हुए,महाभारत  के महायौध्दा एवं मुख्यपात्र संवेदनशील पाॅच पांडवपुत्र का जीवनदर्शन जो एक खुली किताब की तरह हैं,जिसे कोई भी पढ़ सकता हैं,के सर्दभ में अपनी शैली में कुछ लिख रहा हूॅ,पाॅचों कुन्तीपुत्र अपनी ममतामयी माॅ  से इतना प्रेम करते थे कि  उनकी आज्ञा के बिना कोई महत्वपूर्ण निर्णय नही लेते,माॅ की रूची अनुसार भोजनप्रसादी की साम्रगी तैयार करना तथा  उनकी सेवा में एक ना एक

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निरंतर तैनात रहते थे,उनकी मातृभक्ति के कारण ही श्रीकृष्णा उनके प्रिय  सखा और मार्गदर्शक की भूमिका में जूडे रहे,नारी के सम्मान के लिए महाभारत युध्द हुआ,प्रसंग बस पाॅचों पाडंव पुत्र जब अपने धनुधर भाई अर्जुन के स्वयंवर पर विजयी राजकुमारी दौपती को अपने निवास पर लेकर आते और दरवाजे से आवाज लगाते हैं,माॅ देखो हम आपके लिए क्या लाये हैं,माॅ कुन्ती आदतन् बोल उठी जो भी लाये हो ,तुम पाॅचों आपस बाॅट लो,इतिहास साक्षी  हैं अनजाने में बोले माॅ के इस  वचन की भी मर्यादा पाडॅवों ने निभाई,,ॐश्री राधेकृष्णाबोले,राधेराधे,

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