T-20/32 मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं-स्वप्निल तिवारी “आतिश”

कवि ने भावनाओं को प्रकृति के रंग में पिरो दिया हो जैसे,,

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं
हम तिरी याद की बौछार संभाले हुए हैं

दश्त के हो चुके सारे कि जो दीवाने थे
हुस्ने-जानाँ को तो हुशियार संभाले हुए हैं

तुम गुज़र सकते हो कतरा के सफ़ीने वालो
हम तो दरिया हैं सो मँझधार संभाले हुए हैं

गिर के टूटेगी अभी एक छनाके के साथ
इक हंसी जिसको ये रुख़सार संभाले हुए हैं

तंग हैं इस लिये बाज़ार में जाते ही नहीं
हाय वो लोग जो बाज़ार संभाले हुए हैं !!!

इश्क़ और मैं तो हमआहंग हैं कब से कि मुझे
उसकी ऊँगली से जुड़े तार संभाले हुए हैं

आपको क़ैद का जो वह्म हुआ है हज़रत
‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’

पांव धरते ही ज़मीं सब्ज़ हुई जाती है
आप बरसात के आसार संभाले हुए हैं?

नींव से शोर सा उठता है इक ‘हैया हो’ का
ये वो साये हैं जो दीवार संभाले हुए हैं

वो किसी…

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